आलोचक रमेशराज द्वारा 'साधारणीकरण' का विरोध
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रमेशराज आधुनिक काल के एक ऐसे प्रख्यात कवि, आलोचक और आचार्य हैं जिन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र के सर्वमान्य 'साधारणीकरण' सिद्धांत को चुनौती देते हुए एक नए 'आत्मीयकरण' सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। पारंपरिक आचार्यों (जैसे भट्टनायक, विश्वनाथ, अभिनवगुप्त आदि) द्वारा प्रतिपादित साधारणीकरण की मान्यताओं का विरोध करने के कारण उन्हें साधारणीकरण विरोधी आधुनिक आचार्य के रूप में देखा जाता है। [1]
आचार्य रमेशराज (रमेशचन्द्र गुप्त) के इस सिद्धांत और वैचारिक दृष्टिकोण की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:1. साधारणीकरण का विरोध और उसकी सीमाएँपारंपरिक काव्यशास्त्र में माना जाता है कि रस निष्पत्ति के लिए 'साधारणीकरण' (असाधारण/विशेष पात्र का सामान्य या निर्विशेष हो जाना) अनिवार्य है। इसके तहत पाठक या दर्शक अपने पूर्वग्रहों और 'स्व' व 'पर' के भेद से मुक्त होकर एक सामान्य भूमि पर पहुँचता है। [1] रमेशराज का तर्क:
वे साधारणीकरण को एक अधूरी या कई जगहों पर असफल प्रक्रिया मानते हैं। उनका कहना है कि अपनी रुचि के विपरीत या सर्वथा भिन्न काव्य-सामग्री के प्रति पाठक का पूरी तरह साधारणीकरण नहीं हो सकता। [1] (https://sahityapedia.com/post/76940/
वे 21वीं सदी की कविता और आधुनिक जीवन की जटिलताओं के संदर्भ में 'साधारणीकरण' के स्थान पर 'आत्मीयकरण' की सार्थकता को अधिक प्रासंगिक मानते हैं। [1] (https://www.facebook.com/groups/1051227921584390/posts/1660826947291148/)2. 'आत्मीयकरण' सिद्धांत का प्रतिपादन आचार्य रमेशराज के अनुसार, रस का वास्तविक आस्वादन साधारणीकरण से नहीं बल्कि आत्मीयकरण से होता है। [1] (https://rachnaye.com/books/poetry/taak-dhinadhin-bacche-nache-hindi-by-rachnaye-fulfilled), [2] (https://www.facebook.com/groups/1051227921584390/posts/1660826947291148/)
सिद्धांत का मूल स्वरूप:
आत्मीयकरण वस्तुतः "पर" (दूसरे या बाहरी तत्व/पात्र) के "स्व" (अपने अंदर) में विलीन होने की प्रक्रिया का नाम है। [1] (https://ramesaraja-tevarikara-rameshraj-tewarikar-ka-manca.quora.com/
जहाँ साधारणीकरण में पात्र का 'विशेषत्व' समाप्त हो जाता है और वह केवल 'सामान्य' रह जाता है, वहीं आत्मीयकरण की प्रक्रिया में पाठक या सहृदय काव्य के तत्वों को अपनी आत्मीयता के घेरे में ले लेता है, जिससे उसकी रागात्मकता और गहरी हो जाती है। [1] (https://hi.wikipedia.org/
(https://ramesaraja-tevarikara-rameshraj-tewarikar-ka-manca.q (https://sahityapedia.com)
विरोध रस' की स्थापना-
आचार्य रमेशराज ने केवल साधारणीकरण का ही विरोध नहीं किया, बल्कि पारंपरिक नौ रसों की परिधि से आगे बढ़कर काव्यशास्त्र में 'विरोध रस' नाम के एक सर्वथा नए रस की स्थापना भी की है। आधुनिक युग के संघर्षों, विसंगतियों और सामाजिक-राजनैतिक चेतना को अभिव्यक्त करने के लिए वे इस रस को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। [1] (https://rachnaye.com/books/poetry/taak-dhinadhin-bacche-nache-hindi-by-rachnaye-fulfilled)4.
साहित्यिक आंदोलन में योगदान (तेवरी आंदोलन) काव्यशास्त्र के सिद्धांतों के अलावा व्यवहारिक धरातल पर रमेशराज ने हिंदी साहित्य में ग़ज़ल के समानांतर 'तेवरी' आंदोलन चलाया। उन्होंने शोषित और आम जनता की मुखर आवाज़ को कविता के केंद्र में लाने के लिए 'तेवरीपक्ष' नामक त्रैमासिक पत्रिका का संपादन किया और कई तेवरी संग्रह भी प्रकाशित किए। [1] (https://rachnaye.com/books/poetry/taak-dhinadhin-bacche-nache-hindi-by-rachnaye-fulfilled)
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